Wednesday, Apr 22, 2026
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चुनाव याने वोटर – कार्यकर्ताओं को घुघ्घू बनाने का खेल…
न काहू से बैर/ राघवेंद्र सिंह
नया इंडिया/भोपाल
आमतौर से लोग अपना हित साधने के मामले में जोड़- जुगाड़ कर कामयाब हो जाते हैं। इसी काबिलियत के लिए देशज जुबान में ‘उल्लू सीधा’ करने का जुमला इस्तेमाल किया गया है। दीपावली और चुनाव आगे पीछे ही पड़ रहे हैं इसलिए उल्लू बनाने और उल्लू जगाने के दिन चल रहे हैं। ऐसे में इस मुद्दे पर बात करने का मौका भी है, मौसम भी है और दस्तूर भी।
तंत्र मंत्र के कर्मकांड समाज और सियासत में उल्लू को देसी बोली में घुघ्घू भी कहा जाता है। जिससे मतलब निकाला जाता है,ठगा जाता है अर्थात उसे घुघ्घू बनाया हैं। जो घुघ्घू बनते आए हैं उनसे पूरी सहानुभूति के साथ बता दें कि जैसे ही तांत्रिक को सिद्धि मिलती है वह उल्लू की गर्दन मरोड़ देता है। राजनीति में पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक नेता-राजनेता, नायक- महानायक चुनावी दिनों में कार्यकर्ताओं और मतदाताओं को सिद्ध करने के लिए वादों, संकल्प और वचन पत्रों के तंत्र मंत्र का प्रयोग करता है। इस कर्मकांड में साम- दम, दंड- भेद का इस्तेमाल करते हैं। चुनाव की भांति दीपावली की महारात्रि में सिद्धि के लिए तांत्रिक भी पहले से ही उल्लू पकड़ कर या पाल कर रखते हैं। यह साधना कठिन होने के साथ बहुत बार जान के जोखिम भरी भी होती है। लेकिन साधक योग्य है तो समझो पौं बारह। पांचों उंगलियां घी में और सिर कढ़ाई में।
घुघ्घू जगाने वाले बताते हैं कि घुघ्घू का पूरा शरीर और उसके अंग प्रत्यंग तांत्रिक क्रिया और प्रयोग में बेहद अहम होते हैं लेकिन उनके बारे में उल्लू ही सब जनता है। वह अमावस्या की रात तांत्रिक प्रयोगों के दौरान अपने नाखूनों से पंख, पैर लेकर आंख-नाक और सिर तक के क्या लाभ हैं सब बताता है। मगर तन्त्र क्रिया में विशेषज्ञ जानते हैं कि उल्लू जब अपनी जुबान का महत्व बताए उसके पहले ही उसकी गर्दन मरोड़ देना चाहिए। ऐसा करने से चूके तो तांत्रिक की जान खतरे में पड़ जाती है। सही समय पर गर्दन मरोड़ी तो सब समझो सिद्ध वरना आप परेशानी में। राजनीति करने वाले घाघ नेता घुघ्घू सिद्ध करने में पारंगत है तो वे एक दो बार नही पूरी जिंदगी कार्यकर्ताओं और मतदाताओं को सिद्ध कर सकते है अर्थात “ठग” सकते हैं। जिन्हें यह कठिन काम सफलतापूर्वक करते हुए देंखे हम मान सकते हैं कि ये महानायक उल्लू सिद्ध करने और गर्दन मरोड़ने में सिद्धहस्त हो चुके हैं। ये मुश्किल काम हर बरस दीपावली पर आता है लेकिन लोकतंत्र में मुंडी मरोड़ने का यह अवसर आमतौर से पांच साल में आता है। बिहार में विधानसभा के चुनाव हैं। इसके साथ मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के साथ कुछ राज्यों उप चुनाव भी हो रहे हैं। मप्र में सबसे ज्यादा 28 सीटों पर चुनाव हो रहे हैं। इसमें सरकार के साथ नेताओं का भविष्य भी दांव पर है। सभी छोटे- बड़े नायक- महानायक अपने अपने तांत्रिकों के साथ उल्लू सिद्ध करने और फिर मुंडी मरोड़ने के प्रयास में जुटे हैं। जीवन मरण का मामला जो ठहरा… प्रदेश में तीन नवंबर 2020 को शाम वोट पड़ने के साथ सियासत की सिद्दि मिशन पूरा होगा। इसके बाद वादों और संकल्प व वचन पत्रों के साथ घुघ्घूओं की गर्दन अगले चुनाव में मरोड़ने का तंत्रमंत्र और कर्मकांड आरम्भ होगा तब तक प्रभु सबका कल्याण करें…

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