हरि ऊँ तत् सत्
गीतोपनिषद्
श्रीमद् भगवद् गीता
यथारूप
अध्याय दो
गीता का सार
सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि।
।। २.३८ ।।
श्रीकृष्ण जी कहते हैं कि–हे अर्जुन! तुम सुख या दुख, हानि या लाभ, विजय या पराजय का विचार किये बिना युद्ध के लिए युद्ध करो।ऐसा करने पर तुम्हें कोई पाप नहीं लगेगा।
भरोसा
नई सोच नई उड़ान
- श्री भगवान् उवाच *

