Wednesday, Apr 22, 2026
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पत्रकारों की दुनिया में ये 3 शब्द बहुत मायने रखते हैं, पर अब इनका मतलब ही खत्म हो गया

पत्रकार यदुवंशी ननकू यादव नया इंडिया सतना मध्य प्रदेश

बहुत सारे वरिष्ठ पत्रकार अब अपने को नए माहौल में ढाल नहीं पा रहे हैं

पत्रकारिता की परिभाषाएं और उदाहरण अब बिल्कुल बदल गए हैं। बहुत सारे पत्रकार अब अपने को नए माहौल में ढाल नहीं पा रहे हैं, क्योंकि उन्होंने जो सीखा, वह आज बेकार हो गया है। अपनी पूरी जिंदगी उनके सामने सिद्धांतों का पीछा करने की कहानी है और वह सिद्धांत बहुत साधारण हैं। हमारी यानी पत्रकारों की दुनिया में 3 शब्द बहुत मायने रखते हैं। रिपोर्ट, ब्रेकिंग न्यूज और स्कूप। आज पत्रकारों के संस्थानों में या फिर जो लोग टीवी पत्रकारिता कर रहे हैं, वे इन शब्दों का अलग-अलग मतलब समाप्त कर चुके हैं।

रिपोर्ट वह होती है, जिसके तथ्य सभी के लिए उपलब्ध होते हैं। यह पत्रकारों के ऊपर होता है कि वह सभी तथ्य अपनी रिपोर्ट में शामिल करें या फिर कुछ को शामिल करें और कुछ को छोड़ दें। लेकिन अक्सर देखते हैं कि रिपोर्ट में बहुत से तथ्य निर्मित किए जाते हैं, जो वास्तविकता से थोड़े अलग होते हैं। कभी-कभी यह तथ्य पत्रकार की राजनीतिक विचारधारा के नजदीक होते हैं। होना यह चाहिए कि रिपोर्ट सत्य पर आधारित हो और विचारधारा के आधार पर एडिट पेज का लेख हो।

दूसरा शब्द है ब्रेकिंग न्यूज़। इसका मतलब होता है कि कोई खबर यदि सबसे पहले किसी न्यूज चैनल के पास आए तो वह उसे सबसे पहले दिखाए और उसे ब्रेकिंग न्यूज कहे। लेकिन एक ही खबर किसी एक चैनल पर आई और अचानक वह चैनल की ब्रेकिंग न्यूज़ बन गई। शाम तक वह खबर ब्रेकिंग न्यूज के रूप में ही अधिकांश चैनल्स पर आती रही। दर्शक यह समझ ही नहीं पाता कि किस चैनल ने न्यूज ब्रेक की है और किस पत्रकार के हिस्से में इसका श्रेय जाता है। सभी चैनल एक साथ खबर को ब्रेक करने का श्रेय लेते हैं। शाम तक एक ही खबर को ब्रेकिंग न्यूज में चलाना दर्शकों के साथ अन्याय है, जिसका ध्यान कोई न्यूज चैनल नहीं रखता।

तीसरा शब्द है स्कूप। इस शब्द का आजकल कोई महत्व नहीं रह गया। अब ऐसे पत्रकार खासकर न्यूज चैनल में नहीं हैं, जो स्कूप कर सकें, क्योंकि इसके लिए जिस मेहनत, जैसा ज्ञान और जैसी विधा चाहिए, वह कहीं छिप गई है। प्रिंट के अलावा टेलिविजन में तो पत्रकार का कोई महत्व रह गया है, ऐसा लगता नहीं है। न्यूज एंकर ही पत्रकार की परिभाषा हो गया है। अगर हम देखें कि कितने न्यूज एंकर हैं, जिनके खाते में 10 या 20 रिपोर्ट भी हैं, तो यह संख्या काफी कम है, इसीलिए उनके सवाल भी बहुत ही हल्की और सतही होते हैं। इनका एक ही काम होता है कि इन्होंने यह कहा, अब आपका इसके ऊपर क्या कहना है। दुर्भाग्य की बात है कि अब विषय का ज्ञान, विषय के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पहलू के बारे में जानना अब आवश्यक नहीं है।

20 साल पहले तक पत्रकार अपने ज्ञान, अपनी मेहनत और अपनी रिपोर्ट की सारगर्भित के लिए जाना जाता था, अब वह अपनी वाकपटुता के लिए जाना जाता है। इसलिए पत्रकारिता अब लोकतंत्र के चौथे खंभे की जगह मनोरंजन के लिए ज्यादा जानी जाती है। पहले अगर हम गलती से गलत रिपोर्ट कर देते थे तो पाठक से क्षमा मांगते थे, लेकिन अब बहुत सारे न्यूज चैनल घंटों के हिसाब से गलत रिपोर्ट खासकर तथ्यात्मक गलती करते रहते हैं और एक बार भी दर्शक से क्षमा नहीं मांगते, बल्कि अपनी उस गलती को बार-बार दोहराकर उसे और पुख्ता करते हैं।

शायद इसलिए अब किसी भी रिपोर्ट का उतना असर नहीं होता, जितना होना चाहिए। फॉलोअप रिपोर्ट तो अब सपना हो गई है। पत्रकारिता में इतनी ज्यादा जलन हो गई है कि किसी दूसरे पत्रकार का या किसी रिपोर्ट का अस्तित्व मानना ही बंद हो गया है। मैं जानता हूं कि इन बातों का लिखना अब कोई महत्व नहीं रखता, क्योंकि आज पत्रकारिता की परिभाषा नए सिरे से लिखी जा रही है और नए सिरे से लिखी जाने वाली यह परिभाषा बहस का केंद्र बनने वाली नहीं है। कभी पीआर जर्नलिज्म को बहुत ही हेय दृष्टि से देखा जाता था, लेकिन अब यह सबसे ज्यादा इज्जतदार और रसूखदार शब्द है।

(मेरे निजी विचार है आपके जो विचार हो अवश्य भेजें*)

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