नवरात्र के अंतिम दिन बुधवार को विविध मोहल्लों में घर-घर में विराजित किए गए जवारा का विसर्जन सादगी से किया गया। हर साल धूमधाम से बैंड बाजे के साथ जवारा यात्रा निकलती थी। भक्तगण, नुकीले तीर, भाले अपने गाल, छाती, हाथों पर भेदकर निकलते थे, इसे सांग बाना धारण करना कहा जाता था। जिनकी मन्नत पूरी होती थी, वे युवा तीर, भाला से अपने शरीर को छेदकर यात्रा में शामिल होते थे। इस बार कोरोना महामारी को देखते हुए सांग बाना धारण नहीं किया गया।
महामारी खत्म करने की मांगी दुआ
महिलाएं सिर पर कलश जवारा रखकर नंगे पैर यात्रा में शामिल हुई। भक्तों ने मां दुर्गा से कोरोना महामारी को खत्म करने की प्रार्थना की। इस बार सादगी के साथ महिलाएं अपने सिर पर जवारा लेकर चल रही थी , भक्तगण जसगीत गाते चल रहे थे। यह नजारा महावीर नगर, कुशालपुर, पुरानी बस्ती में दिखाई दिया। मोहल्ले के पास स्थित तालाब में ही जवारा विसर्जन किया गया।
घर की कन्याओं को ही देवी मानकर पूजा
नवमी तिथि पर कन्या पूजन की मान्यता के चलते इस बार कोरोनावायरस को देखते हुए घर की कन्याओं को ही देवी स्वरूप मानकर उनकी पूजा अर्चना की गई । हर साल मोहल्ले की 9 कन्याओं को घर घर आमंत्रित करके भोजन करवाकर उपहार दिया जाता था। इस बार बालिकाओं को नहीं बुलाया गया। घर की कन्याओ को ही पूजने की परंपरा निभाई गई।
मंदिरों में सामूहिक कन्या पूजन नहीं
देवी मंदिरों में सामूहिक कन्या पूजन किया जाता था, लेकिन इस बार ट्रस्टियों, पुजारी, सेवादारों ने अपने परिवार की कन्याओं को दूर-दूर बिठाकर एक-एक करके उनकी पूजा की।


